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धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

धारा 377

धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वो धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार और जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने LGBT समुदाय के पांच सदस्यों द्वारा दायर एक याचिका पर प्रतिक्रिया मांगने के लिए केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया है  कि वे अपने प्राकृतिक यौन वरीयताओं के कारण पुलिसिया डर के साए में रहते हैं।

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गौरतलब है कि अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि गोपनीयता का अधिकार मौलिक अधिकार है, इसके बाद LGBTQ समुदाय के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता और वकीलों ने यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए एक मजबूत मामला बनाया। पीठ नवतेज सिंह जोहर द्वारा दायर की गई एक नई याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें धारा 377 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। बता दें कि इस धारा में वयस्कों पर मुकदमा चलाने का भी प्रावधान है। जोहर की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातर ने कहा कि दंड संबंधी प्रावधान असंवैधानिक है जो इस तरह का सेक्स कर रहे हैं। 

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ज्यादातर का तर्क था कि आप जेल में उन दो वयस्कों को नहीं डाल सकते हैं जो अप्राकृतिक यौन संबंधों में शामिल हैं। हाल ही में नौ न्यायाधीशों की ओर से राइट टू प्राइवेसी मामले में कहा गया था कि यौन साथी चुनने का अधिकार मौलिक अधिकार का हिस्सा है। उन्होंने 2009 के उच्च न्यायालय के फैसले को भी एनजीओ ‘नाज फाउंडेशन’ की याचिका का हवाला दिया जिसमें प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया गया था। ज्ञात हो 2 जुलाई 2009 को नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो व्‍यस्‍क आपसी सहमति से एकांत में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी।

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इसके चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया, और समलैंगिगता को अपराध माना सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को  होमो सेक्‍सुअल्‍टी के मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक जजमेंट में समलैंगिगता मामले में उम्रकैद की सजा के प्रावधान के कानून को बहाल रखने का फैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दो बालिगो के आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा जबतक धारा 377 रहेगी तब तक समलैंगिक संबंध को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

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इस विषय में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ,न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट दिसंबर 2013 के फैसले से धारा 377 की वैधता को बरकरार रखा गया है, जो कहता है कि समान लिंग के वयस्कों के बीच संभोग एक अपराध है। पीठ ने कहा कि इस पर बड़ी पीठ द्वारा इस पर पुनर्विचार किये जाने की जरूरत है।

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