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पुरुष या स्त्री, किसको मिलता है संभोग में सबसे ज्यादा आनंद!

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पुरुष या स्त्री, किसको मिलता है संभोग में सबसे ज्यादा आनंद!  माना जाता है कि पुरुष दिन में कई बार सहवास क्रिया का आनंद लेना चाहते हैं, वहीं एक सच्चाई यह भी है कि महिलाएं भी पुरुषों की तरह ही आनंदित होती हैं। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य यह है कि महिला या पुरुष में से किसको शारीरिक संबंध बनाते वक्त अधिक आनंद मिलता है?  इस विषय पर वैज्ञानिकों के बीच मतभेद हैं क्योंकि आनंद को परिभाषित करना बहुत ही मुश्किल है। मानवीय कल्पना बहुत ही जटिल होती है और सेक्सुअल रिलेशन की तस्वीर तो और भी धुंधली है। कुछ लोग जिन्होंने कभी स्त्री के शरीर को ही नहीं देखा वे केवल  उसकी एड़ी को देखकर भी उत्तेजित हो सकते हैं। वहीं दक्षिणी अमेरिका में बीच में पला बढ़ा शख्स है और उसे हजारों लड़के औऱ लड़कियों को बिकीनी में देखा है, उसकी प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होगी।

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पुरुष से स्त्री ट्रांससेक्सुअल और स्त्री से पुरुष ट्रांससेक्सुअल पर की गई स्टडीज से अलग-अलग निष्कर्ष निकाले गए। न्यूरोबायलॉजिकल स्टडीज से पता चलता है कि पुरुषों को यौन क्रिया के दौरान आनंद तेजी से मिलता होता है जबकि महिलाओं का आनंद धीमी गति वाला होता है। इसीलिए कई बार पुरुष अपर्याप्त आनंद महसूस करते हैं। कुछ मानवविज्ञानियों का कहना है कि शायद इसी वजह से पितृसत्तात्मक समाज की स्थापना हुई होगी। पुरुष बेसब्र होते थे और लगातार उन्हें यह एहसास होता था कि वे महिलाओं के लिए बहुत योग्य और पर्याप्त नहीं हैं। इसीलिए उन्होंने महिलाओं की सेक्सुअल आजादी को खत्म करने के लिए कई नियम-कानून स्थापित कर दिए होंगे।

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ऐसे ही एक कहानी है कि बहुत समय पहले भंगस्वाना नाम का एक राजा रहता था। वह न्यायप्रिय और यशस्वी था लेकिन उसके कोई पुत्र नहीं था। पुत्र की चाह में उस राजा ने ‘अग्नीष्टुता’ अनुष्ठान किया। हवन में केवल अग्नि देवता का आदर हुआ था इसलिए देवराज इन्द्र काफी क्रोधित हो गए। इन्द्र अपने गुस्से को निकालने के लिए दंड देना चाह रहे थे। एक दिन राजा शिकार पर निकला तो इन्द्र ने राजा को सम्मोहित कर दिया। राजा भंगस्वाना जंगल में इधर-उधर भटकने लगा। अचानक उसे एक छोटी सी नदी दिखाई थी जो किसी जादू सी सुन्दर लग रही थी। राजा उस नदी की तरफ बढ़ा और पहले उसने अपने घोड़े को पानी पिलाया, फिर खुद पिया। जैसे ही राजा नदी ने नदी का  पानी पिया, उसने देखा की वह बदल रहा है। धीरे-धीरे वह एक स्त्री में बदल गया। शर्म से बोझल वह राजा जोर-जोर से विलाप करने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा उसके साथ क्यूं हुआ।

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राजा भंगस्वाना सोचने लगा, “हे प्रभु! आदमी से औरत बन जाने के बाद मैं राज्य की जनता को क्या मुंहू दिखाऊंगा? मेरे अग्नीष्टुता’ अनुष्ठान से मेरे 100 पुत्र हुए हैं, उनका सामना कैसे करूंगा, क्या कहूंगा? मेरी रानी, महारानी जो मेरी प्रतीक्षा कर रहीं हैं, उनसे कैसे मिलूंगा? मेरे पौरुष के साथ-साथ मेरा राज-पाट सब चला जाएगा”। स्त्री के रुप में जब राजा वापस पँहुचा तो उसे देख कर सभी लोग हैरान रह गए। राजा ने सभा बुलाई और फैसला सुनाते हुए कहा कि वह अब राजपाट छोड़कर बाकी जीवन जंगल में बिताएंगे। ऐसा कह कर वह राजा जंगल की तरफ प्रस्थान कर गया। वहां जाकर वह स्त्री रूप में एक तपस्वी के आश्रम में रहने लगी जिनसे उसने कई पुत्रों को जन्म दिया। अपने उन पुत्रों को वह अपने पुराने राज्य ले गयी और अनुष्ठान से हुए बच्चों से कहा, “तुम मेरे पुत्र हो जब मैं एक पुरुष था, ये मेरे पुत्र हैं जब मैं एक स्त्री हूँ। तुम लोग मेरे राज्य को मिल कर संभालो। उसके बाद सभी भाई मिलकर रहने लगे।

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सब को सुख से जीवन व्यतीति करता देख, देवराज इन्द्र को गुस्सा आ रहा था। उनमें बदले की भावना फिर जागने लगी। इन्द्र सोचने लगा कि राजा को स्त्री मैं बदल कर मैंने उसके साथ बुरे की जगह अच्छा कर दिया है। ऐसा कह कर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धरा और पहुँच गया राजा भंगस्वाना के राज्य में। वहां जाकर उसने सभी राजकुमारों को भड़का दिया। इन्द्र के भड़काने की वजह से सभी भाई आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे को मार डाला। जैसे ही भंगस्वाना को इस बात का पता चला वह शोकाकुल हो गया। ब्राह्मण के रूप में इन्द्र राजा के पास पहुंचा और पूछा की वह क्यूँ रो रही है। भंगस्वाना ने रोते रोते पूरी घटना इन्द्र को बताई तो इन्द्र ने अपना असली रूप दिखा कर राजा को उसकी गलती के बारे में बताया।

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इन्द्र ने कहा “क्यूंकि तुमने सिर्फ अग्नि को पूजा और मेरा अनादर किया इसलिए मैने तुम्हारे साथ यह खेल रचा।” यह सुनते ही भंगस्वाना इन्द्र के पैरों में गिर गया और अपने अनजाने में किया अपराध के लिए क्षमा मांगी। राजा की ऐसी दयनीय दशा देख कर इन्द्र को दया आ गई। इन्द्र ने राजा को माफ करते हुए अपने पुत्रों को जीवित करवाने का वरदान दिया। इन्द्र बोले, “हे स्त्री रूपी राजन, अपने बच्चों में से किन्ही एक को जीवित कर लो” भंगस्वाना ने इन्द्र से कहा अगर ऐसी ही बात है तो मेरे उन पुत्रों को जीवित कर दो जिन्हे मैने स्त्री की तरह पैदा किया है।  इन्द्र हैरान हो गए। ने इसका कारण पूछा तो राजा ने जवाब दिया, “हे इन्द्र! एक स्त्री का प्रेम, एक पुरुष के प्रेम से बहुत अधिक होता है इसीलिए मैं अपनी कोख से जन्मे बालकों का जीवन-दान मांगती हूँ।”

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राजा के सभी पुत्रों को जीवित कर दिया। उसके बाद इन्द्र ने राजा को दुबारा पुरुष रूप देने की बात की। इन्द्र बोले, “तुमसे खुश होकर हे भंगस्वाना मैं तुम्हे वापस पुरुष बनाना चाहता हूँ” पर राजा ने साफ मना कर दिया। स्त्री रूपी भंगस्वाना बोला, “हे देवराज इन्द्र, मैं स्त्री रूप में ही खुश हूँ और स्त्री ही रहना चाहता हूँ” यह सुनकर इन्द्र उत्सुक हो गए और पूछ बैठे कि राजन, क्या तुम आपस पुरुष बनकर अपना राज-पाट नहीं संभालना चाहते?” भंगस्वाना बोला, “क्यूंकि संयोग के समय स्त्री को पुरुष से कई गुना ज़्यादा आनंद, तृप्ति और सुख मिलता है इसलिए मैं स्त्री ही रहना चाहूंगा।” इन्द्र ने “तथास्तु” कहा और वहां से प्रस्थान किया।

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