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लिव इन रिलेशनशिप | जानिए अपने अधिकार | क्या सबूत होते हैं ज़रूरी!

लिव इन रिलेशनशिप

लिव इन रिलेशनशिप | जानिए अपने अधिकार | क्या सबूत होते हैं ज़रूरी! विवाह को सर्वाधिक पवित्र और सात जन्मों का संबंध मानने वाले देश में सतह के नीचे, और अब तो सार्वजनिक रूप से, एक ट्रेंड बहुत तेजी से जोर पकड़ रहा है। बड़ी संख्या में लोग लिव-इन रिलेशन यानी सहजीवन में रह रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग लिव इन रिश्तों को छिपा भी नहीं रहे हैं। लिव इन की परिभाषा और इसमें रहने वालों के कानूनी अधिकार के बारे में भारतीय अदालतें लगातार फैसले सुना रही हैं। इन फैसलों की वजह से लिव इन रिलेशन को लेकर धुंध अब छंट रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह इस बारे में कानून बनाए। अगर आप लिव इन में हैं, तो सबसे पहले ये जान लें कि आप कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहे हैं। एक ही स्थिति इसका अपवाद है। अगर आप पुरुष हैं और किसी विवाहिता स्त्री के साथ रिश्ते में हैं और यह काम उस स्त्री के पति की सहमति के बिना हो रहा है तो आईपीसी की धारा 497 के तहत आप यानी वह पुरुष व्यभिचार के अपराध का दोषी है और उसे पांच साल तक की सजा हो सकती है। इस मामले में स्त्री पर कोई मुकदमा नहीं चलेगा। यह जरूरी है कि केस उस महिला के पति ने किया हो।

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बहरहाल, 1978 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार एक लिव इन रिश्ते को कानूनी तौर पर सही ठहराया और इसे कानूनी तौर पर विवाह के बराबर ठहराया। जस्टिस कृष्ण अय्यर ने फैसले में लिखा कि अगर पार्टनर्स लंबे समय तक पति और पत्नी की तरह रहे हों, तो पर्याप्त कारण है कि इसे विवाह माना जाए। इसे चुनौती दी जा सकती है, लेकिन यह संबंध विवाह नहीं था, यह साबित करने का दायित्व उस पक्ष पर होगा, जो इसे विवाह मानने से इनकार कर रहा है। इन को विवाह के समकक्ष रखकर अदालतों ने समाज के बदलाव को स्वीकृति दी वरना आज लाखों लिव इन रिश्ते गैरकानूनी होते और इसमें रह रही महिलाओं और इससे पैदा हुए बच्चों के कोई कानूनी अधिकार न होते। अदालतों ने लगातार ऐसे फैसले दिए हैं जिससे लिव इन संबंधों का दर्जा विवाह के बराबर होता जा रहा है।

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लिव इन संबंधों के पांच प्रकार हैं:

1) विवाहित पुरुष और वयस्क अविवाहिता स्त्री के बीच आपसी सहमति से घरेलू संबंध

2) अविवाहित पुरुष और विवाहित महिला के बीच आपसी सहमति से घरेलू संबंध

3)  समान सेक्स के लोगों के बीच के आपसी सहमति से घरेलू संबंध

4) विवाहित स्त्री और विवाहित पुरुष के विवाह संबंध के बाहर के आपसी सहमति से घरेलू संबंध

5)  अविवाहित और वयस्क स्त्री और पुरुष के बीच के घरेलू संबंध

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2010 के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने एक के बाद एक दिए गए फैसलों में यह कहा है कि लंबे समय तक अगर दो पार्टनर पति और पत्नी की तरह जीवन बिता रहे हैं तो उसे शादी में होना माना जाएगा और ऐसे संबंधों के टूटने की स्थिति में महिला को अपने लिव इन पार्टनर से भरण-पोषण भत्ता पाने का अधिकार होगा। यानी यह नहीं हो सकता है कि कोई पुरुष किसी महिला के साथ लिव इन में लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे और जब मन आए, उसे छोड़कर मुक्त हो ले। उसे अपनी पार्टनर को मैंटेनेंस की रकम देनी होगी। 2010 के ही एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक लिव इन में रही एक महिला को पार्टनर की जायदाद का अधिकारी माना, जबकि परिवार वाले दलील दे रहे थे वह महिला “रखैल”  है।

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इस तरह से लिव इन संबंधों को डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट यानी घरेलू उत्पीड़न कानून के तहत ले आया गया है। लिव इन संबंधों के टूटने के स्थिति में महिलाएं इस कानून के आधार पर गुजारा भत्ता मांग सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के एक फैसले में यह भी बताया है कि किन रिश्तों को कानूनी दृष्टि से लिव इन रिलेशन माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक कोई रिश्ता लिव इन रिलेशन तभी है, जब-

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1)  सार्वजनिक व्यवहार में अगर दोनों पार्टनर पति और पत्नी की तरह व्यवहार कर रहे हों, तो दोनों को लिव इन रिलेशनशिप में होना माना जाएगा।

2)  अगर दोनों पार्टनर घरेलू काम मिल जुलकर कर रहे हों तो इस रिश्ते को लिव इन रिलेशनशिप में होना माना जाएगा।

3) कोई रिश्ता लिव इन रिलेशनशिप कहलाएगा अगर पार्टनर पर्याप्त समय तक एक साथ, एक जगह रह रहे हों।

4)  कोई रिश्ता लिव इन रिलेशनशिप कहलाएगा अगर दोनों पार्टनर अपने संसाधन बांट रहे हों। एक पार्टनर अगर दूसरे पार्टनर को लगातार संसाधन यानी रिसोर्स दे रहा है, और यह लंबे समय तक हो रहा हो, तो रिश्ता लिव इन कहलाएगा।

5)  लिव इन रिलेशनशिपको कानूनी मान्यता के लिए जरूरी है कि पार्टनर के बीच यौन संबंध हों।

8)  अगर इस संबंध के दौरान बच्चा पैदा होता है, तो रिश्ते को लिव इन रिलेशनशिप माना जाएगा।

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खासकर साझा वित्तीय संबंध को परिभाषित करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह तब साबित होगा अगर दोनों या कोई अपने पार्टनर को आर्थिक रूप में मदद करता हो, दोनों के साझा बैंक एकाउंट हों, ज्वायंट नाम से या महिला के नाम से दोनों ने प्रॉपर्टी खरीदी हो, दोनों ने मिलकर लंबी अवधि का निवेश किया हो, शेयर खरीदें हों। कुल मिलाकर अगर आप लिव इन में हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि आप रखैल नहीं हैं कि पार्टनर जब चाहे आपको छोड़ दे। आपके पास वो सारे कानूनी अधिकार हैं, जो किसी पत्नी को हासिल हैं। सावधानी यह बरतनी होगी कि आपको लिव इन में होने के सबूत सुरक्षित रखने चाहिए। खासकर आर्थिक लेनदेन के कागज रखने चाहिए। साथ रहने के सबूत रखने चाहिए। लिव इन में रहना है तो रहिए। लेकिन याद रहे कि इस संबंध में आपके कानूनी अधिकार हैं। लगभग उतने ही जितने अधिकार शादी में हैं। घरेलू हिंसा से आपको संरक्षण प्राप्त है। प्रॉपर्टी पर अधिकार हैं। संबंध विच्छेद की स्थिति में गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है। बच्चे को विरासत का अधिकार है।

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