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मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने पर गलत इस्तेमाल होगा, ये तर्क सही नहीं!

मैरिटल रेप

मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने पर गलत इस्तेमाल होगा, ये तर्क सही नहीं! दिल्ली हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप के मुद्दे पर दायर पिटीशन पर सोमवार को सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि ये तर्क ठीक नहीं है कि मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने से इसका गलत इस्तेमाल होगा। बता दें कि केंद्र सरकार इसे अपराध के दायरे में नहीं लाना चाहती। सरकार मैरिटल रेप को लेकर हाईकोर्ट में एक हलफनामा भी दाखिल कर चुकी है। केस की सुनवाई हाईकोर्ट की एक्टिंग चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरिशंकर की बेंच कर रही है।

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सरकार ने हाईकोर्ट में दिए अपने एफिडेविट में कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने से इसका गलत इस्तेमाल शुरू हो जाएगा। ये पतियों के खिलाफ एक हथियार बन जाएगा। इससे मैरिज इंस्टीट्यूशन अस्थिर हो सकता है। अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में 15 से 18 साल की नाबालिग पत्नी के साथ संबंध बनाना अपराध माना था। कोर्ट ने कहा था कि रेप कानून मनमाना है और कॉन्स्टीट्यूशन का वॉयलेशन है। बता दें कि आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध के लिए 18 साल की उम्र तय है। लेकिन आईपीसी की धारा 375 में लिखा है कि अगर पत्नी की उम्र 15 साल से ज्यादा है और पति उसके साथ संबंध बनाता है तो वह रेप की कैटेगरी में नहीं आएगा।

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पिटीशन फाइल करने वाले एनजीओ RIT फाउंडेशन और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमन्स एसोसिएशन की वकील करुणा नंदी ने कोर्ट को बताया कि मैरिटल रेप के मामलों में कुछ झूठी शिकायतें भी हो सकती हैं, लेकिन ऐसे केस बहुत कम हैं। उन्होंने कहा कि मैरिटल रेप के केस में मैरिज इंस्टीट्यूशन अस्थिर हो सकता है या इसका इस्तेमाल पतियों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है। ये सारे तर्क इसे अपराध बनाए जाने से नहीं रोक सकते हैं। बहस के आखिर में सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशन्स ने बताया कि देशभर में हर साल करीब 2 करोड़ महिलाएं मैरिटल रेप का शिकार होती हैं। उन्होंने कहा कि जब पाकिस्तान और भूटान जैसे पड़ोसी देशों में मैरिटल रेप अपराध माना गया है। श्रीलंका इसकी तैयारी में है तो भारत को भी इन्हें फॉलो करना चाहिए।

 

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